‘अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’! विश्व संगठन को क्यों कहना पड़ा की एक दिन शांति का मनाते हैं, एक दिन; क्यों? क्योंकि तीन सौ पैंसठ दिन पूरी दुनिया में अशांति है। नहीं तो ज़रूरत नहीं थी की हम ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ मनाएँ। इंसान अशांत क्यों है? क्या कभी सोचा? अपने जीवन को देखो, सुख माँगते रहे पर क्या सुख आया? सुख का एक पन्ना और दुख के दस पन्ने! जीवन में ये खेल है, खेल! कि सुख के पीछे दुख और दुख के पीछे सुख आएगा, लाभ के पीछे हानि और हानि के पीछे लाभ, सम्मान के पीछे अपमान और अपमान के पीछे सम्मान, जन्म के पीछे मृत्यु और मृत्यु के पीछे जन्म चलेगा।
ये सारा खेल कौन बता रहा है? तुम्हारे इस शरीर के किस अंग के अंदर सुख की, लाभ की, सम्मान की, ज़िंदगी जीने की अभिलाषा उठती है? ये तुम्हारा दिमाग है; इस दिमाग में जो अभिलाषा है- वो विचार बनकर गिरती है, विचार! अब अगर विचार तालाब के हैं, तो मच्छर तो आएँगे, परेशानी तो आएगी। अब यह तालाब क्या है? ‘मैं, मैं’ – ये जो तुम्हारा नाम है ‘मैं’, कि मैं अफसर, मैं डॉक्टर, मैं स्टार, ये जो विचार हैं, ये इस अहंकार को पकड़ लेते हैं कि मैं कुछ हूँ। विषय क्या है? ‘मैं’ और उसके साथ जुड़े हुए सारे विचार तुम्हें अंदर के तालाब में गोल-गोल घुमाते हैं और तालाब का सारा पानी मैला होता चला जाता है। ‘मैं’ की बदबू तुम्हारे दिमाग के अंदर गंदगी फैलाना शुरू कर देती है। जैसे ही अहंकार आने लगता है, दिमाग गंदा होने लग जाता है, तुम्हारा दिमाग मैला हो जाता है।
अब ‘मैं’ के बाद आता है ‘मेरा’ -‘मेरा घर’, ‘मेरी गाड़ी’। अब ये जो तालाब की गंदगी थी, वो नाले की गंदगी में बदलनी शुरू हो जाती है। ‘मेरा’ कहते ही अंदर का विषय ‘मेरा’ बना नहीं कि अंदर से ‘मेरा’ की अकड़ आती है, और फिर दिमाग गंदा हो जाता है। इसलिए जिन्हें हम धर्मशास्त्र कहते हैं, जितने भी संसार में हुए, चाहे बुद्ध की धम्मपद हो, महावीर की जिनवाणी, श्रीकृष्ण की गीता, गुरु नानक देव का गुरु ग्रंथ साहिब, जीसस की बाइबिल या कबीर वाणी; सब ग्रंथों में कहा गया है कि जैसे ही तुम्हारी ‘मैं’ और ‘मेरा’ की गंदगी अंदर जाने लगती है, तब तुम्हारे अंदर पूरी सड़न पैदा हो जाती है। तुम्हारा ये गंदा, राक्षस जैसा दिमाग फिर क्या करेगा? कामवासना, क्रोध अंदर तुम्हारे चलने लगेगा! लोभ बढ़ेगा की और-और मिले! मोह बढ़ेगा की मेरा-मेरा! अहंकार उठेगा की मैं-मैं!
अब जब तुम इस तालाब और नाले के अंदर जीने लगोगे, तो ये ज़िंदगी नहीं है प्यारे, ये मौत है, मौत। ये तुम मर-मरकर जी रहे हो! ऐसा जीवन भी क्या जीवन, जिसमें शांति ही नहीं है, जिसमें खुशियाँ ही नहीं हैं, जिसमें सिर्फ अशांति और दुख भरा हुआ है! हर समय चिंता; चिंता बढ़ती ही जाए तो डिप्रेशन, और डिप्रेशन बढ़ता ही जाए तो फिर आत्महत्या। अब सोचो, ये खेल जो तुम खेलते हो, ये सारा तुम्हारे विचारों से होता है। इसलिए अपने विचारों को ध्यान से देखो और जब तुम विचारों को देखोगे, तो पाओगे कि जो भी तुम्हारे अंदर विचार ‘मैं और मेरा’ से चलेंगे, वो गंदे हो जाते हैं। इसलिए कहा गया है कि अगर विचार ही करने हैं, तो ‘तू’ और ‘तेरा’ के करो, ‘तू’ के करो, ‘मैं’ के नहीं। जब तक अंदर ‘मैं और मेरा’ है, शांति तुम्हारे जीवन में मौत तक नहीं आ सकती, तुम चाहे कितना भी ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ क्यों न कह लो। शांति लाने के लिए अंदर से ‘मैं-मेरा’ का विषय बाहर और ‘तू-तेरा’ का विषय अंदर करना होगा, फिर तुम्हारी शांति को इस ब्रह्मांड में कोई छीन ही नहीं सकता।
इसलिए अंदर से ये धारणा बनाओ कि मुझे ‘मैं-मेरा’ से ‘तू और तेरा’ की ओर चलना है। अज्ञान के कारण इंसान गंदगी में गया, अब गुरु के ज्ञान से वापस उस गंदगी से पवित्रता में आएगा। जब ध्यान गुरु के वचनों पर आएगा, तब फिर समाधि होगी यानी ज़िंदगी का समाधान हो गया; अब मैं नहीं तू, अब सब कुछ तेरा है। “मेरा मुझमें कुछ भी नहीं, जो कुछ है सो तेरा।” इसी से तुम्हारे जीवन में आनंद आ जाएगा, शांति आ जाएगी। फिर इस ‘अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस’ की एक दिन की भीख की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, तीन सौ पैंसठ दिन शांति तुम्हारे चरणों को चूमेगी और अब तुम्हें कोई अशांत कर ही नहीं पाएगा; और तभी तुम्हारा ये जन्म सफल होगा।
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सच्ची शांति का समाधान : ‘मैं-मेरा’ से ‘तू-तेरा’अंतर्राष्ट्रीय शांति दिवस और सच्ची शांति का मार्ग

